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मेरे अविश्वास और अनास्था के प्रश्न पर!

जब कि तुम मेरी अवधारणा को अपना लेते हो; मुझे अपनाओ या न अपनाओ कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम मेरे अतिरिक्त जिसकी भी पूजा करते हो: गणेश, महेश, सुरेश गांधी, गौतम, जीसस अल्लाह, नानक कोई भी हो कभी सोचा है कि इन सभी नामों से तुम जिसे मदद के लिए पुकारते हो वह वास्तव में कौन है? क्या तुम्हारा दर्द मुझे तकलीफ नहीं पहुंचाता या मुझे कोई दुख दर्द नहीं है भाई आरंभ काल में मैंने ही नियम बनाए तबसे अबतक कितनी बार समझने वाले बदले समझाने वाले भी नियमों से सारी सृष्टि बंधी हुई है और मैं भी अगर तुम्हें यकीन हो इस एक परम सूक्ष्म क्षण के जीवन में, इस कर्म और भाग्य की चक्की में कई बार पिसा हूं कई बार पिसूगा क्योंकि जब भी कोई सदोश या निर्दोष इस चक्की में पिसता है तो वह मैं ही होता हूं विशुद्ध रूप से पिसते हुए भी सारे नर्कों की असह्य पीड़ा झेलते हुए भी मैं उफ्फ नहीं कर सकता बददुआ नहीं दे सकता भौंहें नहीं हिला सकता मैं विवश हूं जब मेरी भौंहें हिलती हैं तो निलय होता है इस लिए यह तो ऐसे ही बोल उठा था यह जो कुछ मैंने कहा है चक्के का यह अंतिम काल तुम्हें नहीं समझने देगा यह इस समय के लिए है भी नहीं पर मेरे लिए सच है जो स...

ज्ञान के बीज

ज्ञान के वृक्ष नहीं ज्ञान के बीज बोए जाते हैं जिज्ञासा साध्य नहीं साधन है अहंकारमय ज्ञान विशुद्ध सापेक्ष है यह ' साइंस ' सर्वदा अल्पज्ञानी होने के कारण अपेक्षा से अनंत अनियंत्रित है क्षितिज सर्वदा दूर है और कुछ है भी नहीं साइंस गागर में सागर नहीं भर सकता जिसकी वह कोशिश कर रहा है या भविष्य में प्रयास अवश्य करेगा साइंस  शैली बदल सकता है सुख- दुःख को रोक नहीं सकता जब तक कि वह प्रत्येक मानव को दूसरे मानव की आवश्यकता से मुक्त न कर दे साइंस प्रकृति नहीं हो सकता तब क्या यह वही ज्ञान है जिससे विनाश को रोका जा सकता है साइंस मनुष्य के व्यसनों की मजबूरी न बन जाए यह अपना ही विरोधी है उसी कल्पना का अवरोध करता है जिससे इसकी उत्पत्ति हुई यह विश्वासघात का परिणाम है तर्क की चरम परिणति यह उस जूते की तरह है जिसके अभाव में हममें से अधिकांश टांगे होने पर भी यात्रा नहीं कर सकते साइंस पर पूरी तरह से निर्भर किसी व्यक्ति को और एक प्राकृतिक व्यक्ति को यदि एक निर्जन वन में छोड़ दिया जाए तो पूर्वोक्त व्यक्ति पहले खत्म हो जाएगा जिस जानकारी से संतोष न हो मद हो अहंकार हो आत्म- निर्भरता न हो वह भला ज्ञान कैसे...

Airplanes are better than trees!

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How beautiful it is To watch red, white and yellow Airplanes standing in the background And the trees Coming in the way And obstructing my fantasy Suddenly I see another  Look! this Airbender Is on its way to subjugate the clouds Like an airborne chariot Treading on the Cottony highway of the smokey sprinklers No, a large green tree Walked in between And just as the plane was about to take off It drew its green curtains O curse that you had not been only there I would have had my first sight of a take off Who planted them along the walls Of the airport? Wait, these trees were always there Present in the form of jungles Airports were built afterwards Hacking large part of these demigods Human beings just invented these tree devouring flying monsters When they were ashamed to live and work In their own village and tribe Pray you symptoms of luxurious fresh breathing life  Remain till the brink of mankind's age And our deceased bodies Nourish you as manure!

The Ancestral Ravens

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It was the last day of Pitr Paksh The ancestral rituals were over Pandit ji was fed The cloudy sky, it looked Could no more Bear the burden of the condensing  moisture Afternoon was getting dark Suddenly, I realised the cawing I got on the roof And saw three of them Scavenging yet revered dark-hued birds One on the electric pole Other two on the neem trees With a grey strip around their necks I went near one of them Thinking that they would not fly away If by any chance they happened to be My grandparents But alas! they flew How foolish of me to think Of any possible way Of the return of the dead! But how could the little birds Appear only on this almanac day And not regularly Is it because they are wise And the Hindus in the region Have been training their collective consciousness for generations Can a crow remember a day Or is it because today is the day So my mind is making me notice them  only today Or there is something that I need to know There are positive v...

तरंगित हो

तरंगित हो प्रकम्पित हो नभ गर्जन मन गुंजा रहा है अब तो तरंगित हो भूकम्प नगों को हिला रहा है मेरी भांति प्रकम्पित हो श्वास दीपिका बुझी कहां अभी कहां तुम हारे हाहारव पौरुष बरसाए तुम बरसाओ अंगारे ऐसे न व्यर्थ प्रहार करो, ठहरो शत्रु पहचानो संख्या क्या है कहां छिपे हैं यह मुझसे तुम जानो सोचो तनिक ये मन में मित्र क्यों कटक बना विपदा आई कारण भी एक है निज हित के परम शत्रु हो तुम भाई अच्छा होगा इससे पहले कि समर में जा हुकार भरो अंतरतम् के तमस मूल वे यातुधान संहार करो मैं तब तक मन वन के अश्व को विवश करूं अपने पथ पर अंतिम अमृत का यत्न करूं वारुणी न लूं सागर मथ कर सुधा सार मिल जाने पर कुछ ऐसा उद्योग करूं मानवता को अर्पित कर मैं सहर्ष विष-भोग करूं ना जीवन की व्यथा विवशता रोक सके गायन मेरा सारी धरती के तप्त हृदय ही बन जाएं आयन मेरा बल की मेरी महा धारणा सामर्थ्यवान साकार करें बल तिनके को शीश झुका पर्वत पर ध्वंस प्रहार करे तब वीरों के लहू से रणभूमि रंजित अतिरंजित हो तरंगित हो प्रकम्पित हो

बहुत समझाया कि वो दुश्मन है फिर भी ना समझे

बहुत समझाया कि वो दुश्मन है फिर भी ना समझे जख्म सीने पर खा समझे तो क्या समझे? इस तरह कत्ल होने की कोई उम्मीद न थी इस आखरी हमले की भी होगी वजह समझे अपने क़ातिल को किया माफ़ कि वो रोएगा पर उसे इतनी थी नफरत कि वो कहां समझे उसे अपना समझ मिटाए गुनाहों के सबूत उसने मिटा ही दिया तुमको तब उसकी वफा समझे तुम रोज़ बनाते रहे तिनकों का नशेमन क्यूं रोज़ उजड़ जाता था वो आशियां समझे तू कहता है काफ़िर तो पूछ अपने ख़ुदा से तंग आकर वह भी हो गया काफ़िर ख़ुदा समझे                                                      रचना : राम आयनिक

आज बची जो शेष पीढ़ियां वो इतिहास कहेंगी ही।

आज बची जो शेष पीढ़ियां वो इतिहास कहेंगी ही। आक्रांता के झंझावातों का कुछ तो आभास करेंगी ही। कैसे भूलें उस अतीत को जो खुद को दोहराता है। कल का कासिम अब कसाब बन दिल्ली को दहलाता है। दक्षिण में तो बचे रहे उत्तर देवालय कहां गए मुगलों का गौरव ताज महल पर तेज महालय कहां गए प्रतिमानों की क्षति हुई अब स्वयं मूर्तियां बोलेंगी अत्याचारी आक्रांताओं के राज़ सभी ये खोलेंगी बदन बाहु और चरण उठेंगे अथक क्षितिज तक जाने को कुलघाती तैयार रहें करनी का फल पाने को शरण वत्सला भारत भूमि यहां शरण की कमी नहीं स्वयं चयन के योग्य बनो तो स्वतः चयन की कमी नहीं जिनको भी पर शरण चाहिए शरणागति स्वीकार करें इस मिट्टी से तिलक करे इस धरती को प्यार करें आर्जूनेय की निर्मम हत्या पर हे कर्ण कहां थे तुम? द्रौपदियों के चीर हरण पर रक्षक धर्म कहां थे तुम