ज्ञान के वृक्ष नहीं ज्ञान के बीज बोए जाते हैं जिज्ञासा साध्य नहीं साधन है अहंकारमय ज्ञान विशुद्ध सापेक्ष है यह ' साइंस ' सर्वदा अल्पज्ञानी होने के कारण अपेक्षा से अनंत अनियंत्रित है क्षितिज सर्वदा दूर है और कुछ है भी नहीं साइंस गागर में सागर नहीं भर सकता जिसकी वह कोशिश कर रहा है या भविष्य में प्रयास अवश्य करेगा साइंस शैली बदल सकता है सुख- दुःख को रोक नहीं सकता जब तक कि वह प्रत्येक मानव को दूसरे मानव की आवश्यकता से मुक्त न कर दे साइंस प्रकृति नहीं हो सकता तब क्या यह वही ज्ञान है जिससे विनाश को रोका जा सकता है साइंस मनुष्य के व्यसनों की मजबूरी न बन जाए यह अपना ही विरोधी है उसी कल्पना का अवरोध करता है जिससे इसकी उत्पत्ति हुई यह विश्वासघात का परिणाम है तर्क की चरम परिणति यह उस जूते की तरह है जिसके अभाव में हममें से अधिकांश टांगे होने पर भी यात्रा नहीं कर सकते साइंस पर पूरी तरह से निर्भर किसी व्यक्ति को और एक प्राकृतिक व्यक्ति को यदि एक निर्जन वन में छोड़ दिया जाए तो पूर्वोक्त व्यक्ति पहले खत्म हो जाएगा जिस जानकारी से संतोष न हो मद हो अहंकार हो आत्म- निर्भरता न हो वह भला ज्ञान कैसे...
तरंगित हो प्रकम्पित हो नभ गर्जन मन गुंजा रहा है अब तो तरंगित हो भूकम्प नगों को हिला रहा है मेरी भांति प्रकम्पित हो श्वास दीपिका बुझी कहां अभी कहां तुम हारे हाहारव पौरुष बरसाए तुम बरसाओ अंगारे ऐसे न व्यर्थ प्रहार करो, ठहरो शत्रु पहचानो संख्या क्या है कहां छिपे हैं यह मुझसे तुम जानो सोचो तनिक ये मन में मित्र क्यों कटक बना विपदा आई कारण भी एक है निज हित के परम शत्रु हो तुम भाई अच्छा होगा इससे पहले कि समर में जा हुकार भरो अंतरतम् के तमस मूल वे यातुधान संहार करो मैं तब तक मन वन के अश्व को विवश करूं अपने पथ पर अंतिम अमृत का यत्न करूं वारुणी न लूं सागर मथ कर सुधा सार मिल जाने पर कुछ ऐसा उद्योग करूं मानवता को अर्पित कर मैं सहर्ष विष-भोग करूं ना जीवन की व्यथा विवशता रोक सके गायन मेरा सारी धरती के तप्त हृदय ही बन जाएं आयन मेरा बल की मेरी महा धारणा सामर्थ्यवान साकार करें बल तिनके को शीश झुका पर्वत पर ध्वंस प्रहार करे तब वीरों के लहू से रणभूमि रंजित अतिरंजित हो तरंगित हो प्रकम्पित हो
जब कि तुम मेरी अवधारणा को अपना लेते हो; मुझे अपनाओ या न अपनाओ कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम मेरे अतिरिक्त जिसकी भी पूजा करते हो: गणेश, महेश, सुरेश गांधी, गौतम, जीसस अल्लाह, नानक कोई भी हो कभी सोचा है कि इन सभी नामों से तुम जिसे मदद के लिए पुकारते हो वह वास्तव में कौन है? क्या तुम्हारा दर्द मुझे तकलीफ नहीं पहुंचाता या मुझे कोई दुख दर्द नहीं है भाई आरंभ काल में मैंने ही नियम बनाए तबसे अबतक कितनी बार समझने वाले बदले समझाने वाले भी नियमों से सारी सृष्टि बंधी हुई है और मैं भी अगर तुम्हें यकीन हो इस एक परम सूक्ष्म क्षण के जीवन में, इस कर्म और भाग्य की चक्की में कई बार पिसा हूं कई बार पिसूगा क्योंकि जब भी कोई सदोश या निर्दोष इस चक्की में पिसता है तो वह मैं ही होता हूं विशुद्ध रूप से पिसते हुए भी सारे नर्कों की असह्य पीड़ा झेलते हुए भी मैं उफ्फ नहीं कर सकता बददुआ नहीं दे सकता भौंहें नहीं हिला सकता मैं विवश हूं जब मेरी भौंहें हिलती हैं तो निलय होता है इस लिए यह तो ऐसे ही बोल उठा था यह जो कुछ मैंने कहा है चक्के का यह अंतिम काल तुम्हें नहीं समझने देगा यह इस समय के लिए है भी नहीं पर मेरे लिए सच है जो स...
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